मैं उसे ढूंढ नहीं पाऊंगा
कहीं अगर मिल भी जाये
तो पहचान नहीं पाऊंगा
लेकिन मन में रखता हूँ सहेज कर, एक स्मृति
किसी सुगंध
किसी स्पर्श
किसी एहसास की तरह
जिसे शब्दों में ढालो,
तो कुछ बाकी रह जाता है
याद करो तो रंग उड़ने लगते हैं
गौर करो तो आकार मिटने लगते हैं
लेकिन वो पूर्ण है, वहां
जहाँ समय रुका हुआ है
सभी कण और क्षण हैं
विशुद्ध संभावनाओं से भरे
शब्दों, रंगों और आकारों
के प्रपंचों से परे
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